कला का समाज के लिए योगदान एक बहस एक लम्बे अरसे से चली आ रही है और ये बहस शायद आज तक किसी भी मुकाम तक नहीं पहुंची और नाही किसी निष्कर्ष को सामने रख सकी पर फिर भी ये विषय कला चर्चा में मुख्या रूप से विचार के लिए सभी कला चर्चाओं में रखा जाता रहा है, मेरे नजरिये से ये बहस होना ही नहीं चाहिये क्यूकी हर कलाकार अपनी सृजन को पहले सिर्फ अपने लिए रचता हे या इसे यूँ भी कहा जा सकता हे की सबसे पहले वो किसी भी कृति को अपने आनंद के लिए रचता है और उस आनंद से खुद मन ही मन प्रफुल्लित होता है इसके बाद वो उस दूसरों के सामने प्रदर्शित करता है और फिर जब उसे दर्शक पसंद करना शुरू करते हैं तब वो कृति धीरे धीरे समाज की कला बन्ने की और अग्रसर होती है ये उस कृति के समाज से जुड़ने का पहला पायदान होता है और वह लोकप्रिय होने लगती है, इसके बाद शुरू होता हे उसकी प्रशंसा और आलोचना का दौर और ज्यों ज्यों उसकी प्रशंसा या आलोचना दर्शकों के मस्तिष्क में आती है तब ये सोच जन्म लेती हे ( कला और समाज ) और तब उस कलाकृति का समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चिंतन भी शुरू होता है और फिर उसे समाज से जोड़ कर देखा जाना शुरू होता है, अधिकांशतः कला आलोचकों द्वारा जो उस कृति का विश्लेषण किया जाता है वो बड़ा ही खतरनाक होता हे खासकर उस कलाकार के लिए जिसने उसे रचा हो क्यूंकि जहाँ तक मई सोचता हूँ किसी कलाकृति का निर्माण खुद की सारी क्षमता और ऊर्जा को संचित कर एक स्थान पर लाना होता हे उस कलाकार को जो शायद किसी प्रसव जेसा ही होता है और उसके निर्माण के बाद की प्रसन्नत भी वैसी ही होती हे और आलोचकों की आलोचना भी वेसी ही वेदना का अनिभव उस कलाकार को कराती है जैसी उस प्रसूता को होती होगी जिसके जाये बच्चे की कोई आलोचना करता होगा हो सकता है ये मात्र भावुकता हो पता नहीं ठीक से कह पाना मुश्किल हे, और बात है कला को समाज से जोड़ने की पर इसकी शुरुआत इन्ही सब स्थितियों और मनस्थितियों से होकर गुजरती होगी शायद मै ऐसा सोचता हूँ और यही सब तर्क आगे चलकर एक बहस का रूप लेता हैं शायद और किसी सहज कृति को एक कलाकार की अनुपम कला को बहुत ही चालाकी के साथ समाज की उपयोगिता के साथ जोड़ा जाना शुरू होता है, जो शायद कलाकार की उस सहजता को खत्म करता है और उसके सृजन को प्रभावित करता है बात अभी अधूरी है और बहस अभी जारी है ! बातें और भी होंगी बहस आगे तक जाएगी पर अभी थोडा विराम लेना होगा अगर आप भी इसका हिस्सा बनेंगे विषय को कुछ और नयी दिशाएं भी मिलेंगी...........
Toolika
Saturday, 28 January 2012
Tuesday, 13 December 2011
तानसेन समारोह उदघाटन एक शर्मनाक दिन
शर्मनाक दिन तानसेन समारोह का स्थान परिवर्तित कर उसे राजमहल परिसर में आयोजित किया गया जबकि तानसेन को सच्ची श्रधांजलि सिर्फ वहीँ हो सकती हे जहाँ उनकी रूह है | कई श्रोता भी इस बात से रुष्ट दिखाई दिए और कुछ बहुत आहात और हद तो तब और हो गई जब उदघाटन अवसर पर मध्यप्रदेश के संस्कृति मंत्री कहते हैं तानसेन खयाल गायकी के उस्ताद थे, वित्त मंत्री कहते हैं ग्वालियर ,संगीत और कालिदास का गहरा सम्बन्ध है ! ये हैं हमारे नेता ................
Monday, 5 December 2011
Saturday, 26 November 2011
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